Web Book: May 2020

Friday, May 22, 2020

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Web Book: अपनी बात | अधिवक्ता चुनाव | Web Book Blog | अपनी ब...: अपनी बात | अधिवक्ता चुनाव -  January 14, 2020 मै आश्चर्य चकित हूँ कि वकीलों के पास संगठनात्मक चुनावों में व्यय करने के लिए इ...

अपनी बात | अधिवक्ता चुनाव | Web Book Blog | अपनी बात Blog

अपनी बात | अधिवक्ता चुनाव

मै आश्चर्य चकित हूँ कि वकीलों के पास संगठनात्मक चुनावों में व्यय करने के लिए इतना अधिक धन कहां से आता है। पूरे के पूरे न्यायालय परिसर वकीलों के बड़े चित्रों वाले रंग -बिरंगे पोस्टरों से ढक जाते है। दीवाले, दरवाजे कुरूप हो जाते है। कहां से यह धन आता है जिससे बड़ी संख्या में नये सदस्य केवल चुनाव के अवसर पर बनाए जाते है, हालाकि मार्डल बाईलाज ने काफी नियंत्रित किया है। पुराने सदस्यों का बकाया सदस्यता शुल्क अदा हो जाता है।पीने और खाने वालों की शामें तो छोड दे सुबह व दोपहर भी गुलजार हो जाती है। जो वकील कानून की किताबें नही खरीद सकता है चुनाव के लिए कैसे और किस प्रकार रूपयों का जुगाड़ लगाता है, क्यों और किस लिए ? इन प्रश्नों के उत्तर किसी को खोजने नहीं है। कचहरी की दीवालो पर यह स्पष्ट रूप से लिखें हुए है । आज के वकीलों का अधोपतन निश्चित ही अधिवक्ता समाज के लिए ही नही, सम्पूर्ण न्यायिक व्यवस्था खतरे की घंटी है। कचहरी में प्रवेश लेने वाला नवागन्तुक अधिवक्ता संगठनों के चुनाव में सफलता को बधाईयों के बहाने अपने नामों के प्रचार की यह होड़ केवल कचहरी तक ही सीमित नहीं रह गई है बल्कि शहर की मुख्य सड़कों को छोड़कर दुर देहातों में वकीलों के नामों के बैनर बधाई देते नजर आते हैं ।  क्या अब वकीलों को अपनी योग्यता और प्रतिभा पर भरोसा नहीं रह गया है, जो प्रचार व विज्ञापन के बनावटी साधनों का सहारा ले रहे हैं। अधिवक्ता संघ तो शायद कोई कदम इस पतन को रोकने का उठाने का साहस नहीं रखते लेकिन विचारवान अधिवक्ताओं को निश्चित ही छोटे-छोटे अधिवक्ता मंचों के माध्यम से इस प्रकार के कदमों की भर्त्सना अवश्य करनी चाहिए। अधिवक्ता और प्रचार के द्वारा अपना माल बेचने वाले दुकानदार के बीच का अन्तर समाप्त होने से बचाना जरूरी है। अधिवक्ता की अपनी प्रतिष्ठा धन या प्रचार से जुड़ी नहीं है ।  एक निर्धन, ईमानदार अधिवक्ता की प्रतिष्ठा धनवान मगर घूस दिलाने वाले या प्रचार आधारित अधिवक्ता से कहीं ज्यादा आज भी है और भविष्य में भी रहेगी ।
   ----- विधिनय 
     ------- शिव प्रसाद श्रीवास्तव एडवोकेट दीवानी कचहरी मऊ




Sunday, May 17, 2020

न्यायपालिका, राज्य नही है ।

" कानून समाज के लिए है, समाज कानून के लिए नही, इसलिए कानून को समाजिक परिवर्तनो के अनुरूप अपने को ढालना होगा।स्वच्छ और शान्तिपूर्ण समाज एवं परिवारों की आवश्यकताओं के अनुरूप कानून को परिवर्तित होना होगा। न्यायालय न्यायिक कर्तव्यों का निर्वहन करते समय राज्य नही है। राज्य और न्यायालय में अन्तर है। न्यायपालिका जिस समय न्यायिक कर्तव्यों का निर्वहन कर रही है, उसके विरुद्ध किसी भी नागरिक को कोई मूल अधिकार प्राप्त नही है , जहां कोई वादकारी न्यायपालिका के माध्यम से अपने अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उपस्थित होता है, न्यायपालिका राज्य नही रह सकती है , यदि न्यायपालिका राज्य रहेगी तो नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा नहीं होगी । यही कारण है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद - 226 के होते हुए भी अनुच्छेद -227 की रचना करनी पड़ी, जिसके द्वारा उच्च न्यायालय को सभी न्यायालयों और न्यायाधिकरणो पर अधीक्षण की अधिकारिता दी गई है, न्यायिक कर्तव्य के पालन में न्यायालय पक्षकार के मध्य विवादों का निर्णय करते है, वे स्वय वाद मे पक्षकार नही बन जाते है ।इसी कारण न्यायालयों के विरूद्ध अनुच्छेद -226 प्रभावी नही है ।
----शिव प्रसाद श्रीवास्तव एडवोकेट दीवानी कचहरी मऊ