आजादी दिलाने वाली पुस्तक गीता
1-भारत में आजादी दिलाने वाली तमाम पुस्तकों में गीता सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि आजादी की रक्षा किस प्रकार की जाए इसकी विधि केवल गीता में ही मिलती है। हालैंड के सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रनेता मि.डिवेलरा की भेंट जब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से हुई ,तो मि. डिवेलरा ने उनसे पूछा कि " यदि एक ओर आजादी रख दी जाए और दूसरी तरफ गीता, तब आप आजादी लेगें या गीता।" तिलक ने उत्तर दिया, आजादी की अपेक्षा वे गीता को लेना पसंद करेगें, क्योंकि यदि गीता देश में बनी रहेगी, तो देशवासी आजादी कभी न कभी उसके सहारे पा लेगें और यदि गीता देश से चली गई तो प्राप्त की गई आजादी कभी न कभी विलीन हो जाएगी। लोकमान्य तिलक ने मान्डले जेल में रहकर गीता का मनन किया और उसके रहस्यों को उद्घाटत किया ।
तिलक के बाद उनके अनुयायी महात्मा गांधी ने इंग्लैंड में रहकर गीता का मनन किया और माता के रूप में उसको सम्मानित किया।
आचार्य विनोवा भावे गीता पर महत्वपूर्ण ग्रंथ "गीता प्रवचन " के नाम से संपादित किया। अनेक धर्माचार्यो ने गीता पर अपने भाष्य लिखे।वीशवी शदी के उत्तरार्ध में आचार्य रजनीश ने गीता पर अभूतपूर्व बहुमूल्य पुस्तकें लिखी।
आचार्य विनोवा भावे गीता पर महत्वपूर्ण ग्रंथ "गीता प्रवचन " के नाम से संपादित किया। अनेक धर्माचार्यो ने गीता पर अपने भाष्य लिखे।वीशवी शदी के उत्तरार्ध में आचार्य रजनीश ने गीता पर अभूतपूर्व बहुमूल्य पुस्तकें लिखी।
गीता के मूल लेखक महर्षि वेद व्यास है और उन्होंने अपने उद्गगार कृष्ण के मुख से प्रकट किए हैं जिसे महाभारत के भीष्म पर्व के चालिसवे अध्याय में पढा जा सकता है ।
2- भगवत गीता 18 अध्यायों में है, जो संस्कृत के विभिन्न छन्दों में इस विधि से पिरोए गये है ताकि थोडे से अभ्यास में कंठस्थ हो जाऐ ।इसमें 751 श्लोक है जिनमे पहला श्लोक धृतराष्ट्र का है जो हस्तिनापुर के अंधे महाराज है और उस राष्ट्र की बागडोर दृष्टया के साथ पकड़े हुए हैं, उनके सौ पुत्र है ।महाराज शान्तनु के ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण अंधे होने पर भी शासन सूत्र का संचालन उनके हाथ मे था । उनकी तरफ से उनके छोटे भाई पाण्डु शासन का दायित्व सम्भाले हुए थे, उनके अचानक मृत्यु हो जाने के कारण भीष्म पितामह जो शान्तनु के सबसे बड़े पुत्र थे, उनकी सहायता से राज्य का भार सम्भाले हुए थे क्योंकि भीष्म ने प्रतिज्ञा कर चुके थे कि वे स्वय राजा नही बनेगे ।पाण्डु के पाच पुत्र थे। परिवार में संपत्ति संबन्धी विवाद न हो इसलिए विदुर के संकेत पर और भीष्म पितामह के सलाह पर धृतराष्ट्र ने " इन्द्रप्रस्थ " में नई राजधानी स्थापित करा कर राज्य का कुछ भाग पाण्डवों को दे दिया किन्तु धृतराष्ट्र के ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन ने पांडव के सबसे बड़े पुत्र युधिष्ठिर की एक कमजोरी पकड ली कि उन्हें " पासा और दाव " लगाने का विशेष चाव है, इसलिए उसने चालाकी पूर्ण पासे बनवाएं और उनका पूरा राज्य जीत लिया और वेअपने भाईयों और राज्य रानी द्रोपती को भी हार गए । खेल में आखिरी दाव दुर्योधन ने इस बात का लगाया कि अगर पासा युधिष्ठिर के पक्ष में पडा तो उसके द्वारा हारी गई समस्त संपत्ति उनको लौटा दी जाएंगी और वे हार गए तो उन्हें 12 वर्ष तक वनवास में और एक वर्ष अज्ञातवास में रहना पडेगा और यदि अज्ञातवास में पहचान लिए गए तो पुनः 12 साल का वनवास और एक साल का अज्ञातवास भोगना पड़ेगा और यदि शर्त पूरी हो गई तो उनका राज्य 13 वर्ष बाद वापस मिलेगा ।
3- शर्त पूरी होने वायजूद भी 13 वर्ष बाद युर्योधन ने पांडवों को उनका राज्य वापस देना स्वीकार नहीं किया, परिणामस्वरूप युद्ध की तैयारियां दोनो पक्षों के तरफ से शुरू हो गई ।
कृष्ण उस समय के श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ शूरवीर और विद्वान महापुरुष होने के साथ - साथ द्वारिका के अधिशासी भी थे और अपने नाना उग्रसेन की ओर से राज - काज देखते थे, उनके पास जो सेना थी वह नारायणी नाम से जानी जाती थी । पाण्डवों की मां कुन्ती उनकी बुआ थी और उनकी बहन सुभद्रा अर्जुन को व्याही थी । इस प्रकार कौरव और पांडव दोनो उनको अपना सम्बन्धी मानते थे ।
4- दुर्योधन और अर्जुन दोनों कृष्ण के पास सहायता हेतु गये । कृष्ण ने कहा कि एक पक्ष को वे अपनी नारायणी सेना देगें और दूसरे पक्ष में वे अकेले बिना अस्त्र -शस्त्र के शामिल रहेगें, जिसे जो लेना हो, वह पसंद कर ले । दुर्योधन ने नारायणी सेना लेना पसंद किया, अतः निहत्थे कृष्ण अर्जुन के साथ रह गये, उन्होंने अर्जुन का रथ हाकने का कार्य सारथी के रूप में अपने हाथ में लिया और प्रण किया कि वे केवल रथ हाकने का ही कार्य करेगें और इस युद्ध में कभी हथियार नही उठाएंगे ।
भीष्म पितामह ने उनके इस प्रतिज्ञा को भंग करने का व्रत लिया और कृष्ण को हथियार उठाने के लिए वाणो की वर्षा से बचने के लिए विवश किया, अतः कृष्ण ने रथ का पहिया निकाल कर अपनी रक्षा की ।इस प्रकार कृष्ण और भीष्म दोनों की प्रतिज्ञाऐ पूरी हुई , क्योंकि रथ का पहिया कोई हथियार नही था ।यह युद्ध 18 दिन तक चला , जिसमें 9 दिन तक भीष्म पितामह सेना युद्ध का संचालन करते रहे । इस युद्ध में भीष्म के बाद द्रोणाचार्य सेनापति हुए , उन्होंने चक्रव्यूह की रचना की और उसमें अर्जुन सुभद्रा का पुत्र 16 वर्ष का अभिमन्यु मारा गया । इस महायुद्ध में केवल 7 महारथी बचे ।
5- गीता इस महायुद्ध की सबसे बड़ी देन है जो आज भी संसार की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण पुस्तकों मे से एक है । इसके पहले 6 भागो में ज्ञान , दूसरे 6 भागों में भक्ति , और तीसरे व अन्तिम 6 भागों में कर्म का संदेश है ।
कर्म का प्रतिपादन 13 वें अध्याय से प्रारम्भ होता है ।
13 वें अध्याय में 'देह ' को एक क्षेत्र माना गया है और इसके रहस्य को जानने वाले को क्षेत्रज्ञ कहा गया है, जो देह का स्वामी है । हर स्वामी को अपनी सम्पत्ति का पूरा ज्ञान होना चाहिए, यदि उसे अपनी संपत्ति का पूरा ज्ञान नही होगा तो उनका सही उपयोग व उपभोग न कर सकेगा ।
इसे एक कृषक के माध्यम से इस प्रकार समझे, किसान जो खेत का स्वामी है, उसे खेत की मिट्टी की किस्म व खेत तक पानी पहुचने के साधन, किस मौसम में किस चीज की बोआई की जाए कि उसमें कीड़े आदि न लगे । उगी हुई फसल की सुरक्षा कैसे की जाए, पानी कब-कब दिया जाए, पशु पक्षी कीड़े आदि से उसकी सुरक्षा कैसे हो, फसल तैयार हो जाने पर उसकी कटाई, मडाई और भंडारण तथा सदुपयोग करने की योजना बनाना जरूरी होगा, इतना ज्ञान न होने पर उसके पास कृषि भूमि होना न होना सब बराबर है ।
इसका एक उदाहरण एक दूकानदार हो सकता है, जिसका कि वह स्वामी है, उस दुकानदारी का कोई न कोई लक्ष्य होना जरूरी है, यदि वह अगनू की बाजाजी है, वहां 9 ₹ का लाया हुआ कपडा, अगनू 8₹ में बेचता है, फिर भी ग्राहक उसे खुश नही है । दूकान में रखे हुए माल की सुरक्षा कैसे की जाए, कौन सा माल कहां से मगाया जाए, किस समय बेचा जाए, इन सब बातों का विवेक रखना आवश्यक है ।
" जो आजादी सैकडों वर्षो के दासता के बाद पायी गयी है उसे स्थाई,सर्वजन हितकारी , बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित किस प्रकार रखा जाए उनकी जानकारी यदि कोई पुस्तक कराने में सक्षम है तो वह केवल गीता है, जो कि 13 वें अध्याय से कृष्ण ने शरीर के माध्यम से शरीर के मालिक को उसके क्षेत्र का ज्ञान कराना प्रारंभ किया है और 35 श्लोकों के द्वारा शरीर में जितनी संपत्तियां प्रकट और छिपी है, उनका संकेत किया है ताकि उनकी सही जानकारी होने पर उनका लाभ उठाया जा सके ।"
( शिव प्रसाद श्रीवास्तव एडवोकेट दीवानी कचहरी मऊ )
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